TPA
#1 Group of Newspaper & News Portal

डुमरांव महाराज कमल सिंह का निधन

एक इतिहास एक प्रखर ब्यक्तित्व ,लोकतंत्र का पहला सांसद महाराजा कमल सिंह का अंत हो गया।उन्होंने आज अहले सुबह 5.10 बजे अपनी इस जँहा से चले गये ।94 साल के महाराज अपने पैतृक कोठी बक्सर के भोजपुर में अपनी अंतिम सांस लेकर सभी से अलविदा कर गये।

29 सितंबर 1926 को उन्होंने पहली सांस तथा 5 जनवरी 2020 को अन्तिम सांस लेकर सभी को रुला कर चल दिये महाराजा कमल सिंह।

राजघराने की तरफ से महाराजा कमल सिंह के पौत्र शिवांग विजय सिंह ने उनकी निधन होने की बात प्रखर प्रहरी को बताये है।

*दानवीर महाराज के रूप में जाने जाते थे कमल बहादुर सिंह*

महाराजा बहादुर कमल सिंह के जीवन काल मे भले ही राजतंत्र नही था ,लेकिन इस लोकतंत्र के आस्था को जिंदा रखे थे। 1952 से 1962 तक लोकसभा के सदस्य रहे थे ।

महाराज कमल सिंह की सोच समाज को ऊचाइयों ओर ले जाने का हरपल रहा था।उन्हें बच्चो से बहुत ज्यादा लगाव था ।महाराजा कमल सिंह को पता था कि समाज सृजन बच्चो के कंधों पर ही निहित है। बक्सर ही नही बल्कि पूरे शाहाबाद में उन्होंने स्कूल ,कॉलेजों, तथा अस्पताल के लिये न सिर्फ जमीन दान किये बल्कि उनकी निर्माण भी अपने पैसे से ही किये।किसानों के लिए कई नहर, सरोवर और तालाब का निर्माण करवाये।इस इलाके में रहने वाले लोगों को काफी सुविधाएं मिलती रही हैं। चाहे वो भोजपुर जिले के आरा का महाराजा कॉलेज की भूमि हो, जैन कॉलेज के लिए दान दी गई भूमि हो या फिर प्रतापसागर (एनएच-30) में बिहार का इकलौता टीबी अस्पताल को भूमि दान में दे चुके हैं। इसके अलावे विक्रमगंज (रोहतास) में अस्पताल हो या फिर डुमरांव में राज अस्पताल हो इन सभी का इनके द्वारा दान दी गई हैं भूमि। इसी रियासत से जुड़े हुए रहे हैं पटना का प्रसिद्ध मौर्या होटल के मालिक जय प्रकाश नारायण, जो डुमरांव राज के मंत्री हुआ करते थे।

आपको बताते चले भारत मे यहां कभी छोटी-छोटी लगभग 600 से ज्यादा रियासतें हुआ करती थीं। उन्हीं में से एक था बिहार के बक्सर जिले का डुमरांव स्टेट ,और इसके आखिरी महाराजा बहादुर कमल सिंह हुए। देश आजाद हुआ सिंलिंग एक्ट लगी, जरुरत से ज्यादा भूमि की हदबंदी होने लगी। फिर भी डुमरांव राज ने कई ऐसे काम किए जनमानस के लिए कि वो एक इतिहास साबित हुआ। वर्ष 1952 का दौर था, आजादी के बाद पहली बार में चुनाव हुआ, बक्सर संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय कैंडिडेट के रुप में कमल सिंह उस समय सबसे कम उम्र के 32 साल में सांसद चुन लिए गए और इनका निशान था कमल का फूल। संसद की सदन में पहुंचने के बाद कमल सिंह की कार्यशैली ने इन्हें तुर्क नेता के रुप में तो स्थापित किया ही इनकी एक अलग छवि निखरकर सामने आयी और लागातार 1962 तक सांसद बने रहे। हलांकि बाद के दौर में इन्हें हार का भी सामना करना पड़ा।

*राजा होरिल शाह थे डुमरांव राज के संस्थापक*

राजगढ़ वर्तमान में डुमरांव शहर के बीच खड़ा है। परमार क्षत्रिय वंशीय राजा होरिल शाह ने इस नगर की स्थापना की थी। पहले इसे होरिल नगर के नाम से जाना जाता था। 1745 में राजा होरिल ने राजगढ़ के निर्माण की आधार शीला रखी थी। इतिहास की मानें तो इस परिवार के राजा क्षत्रधारी सिंह ने राजमहल और अन्य इमारतों का निर्माण कराया था। महाराजा जय प्रकाश सिंह ने अपने 1805 से 1838 के कार्यकाल के बीच बांके बिहारी मंदिर और बडा बाग का निर्माण कराया था। ये वही बांके बिहारी मंदिर है जिसकी चौखट से शहनाई वादन कर शहनाई नवाज उस्ताद बिस्मिल्लाह खां भारत रत्न तक से नवाजे गए। राजगढ़ के दो विशाल दरवाजों के पास आज भी डुमरांव राज परिवार के सुरक्षा गार्ड तैनात रहते है।

*वर्ष 1940 में डुमरांव राज पुराना भोजपुर शिफ्ट हुआ था।*

डुमरांव शहर से महज 3 किमी उत्तर की ओर पुराना भोजपुर स्थित डुमरांव महाराजा की कोठी है, डुमरांव राज परिवार के युवराज चंद्र विजय सिंह की मानें तो वर्ष 1940 के आसपास पूरा परिवार यहां आ गया, लेकिन राजगढ़ से लगाव कम नहीं हुआ है। आज भी दशहरा में तौजी परंपरा का निर्वहन यहीं होता है।

*विरासत को संभाल रहे कमल सिंह के पुत्र।*

डुमरांव महाराजा कमल सिंह के साथ-साथ उनके दो पुत्र युवराज चंद्र विजय सिंह (बड़ें) दूसरे कुमार मान विजय सिंह का पूरा परिवार इस अहाते में निवास करता है। इस कोठी की खास बात ये है कि इसमें बड़े पैमाने पर खेती होती है। कई परिवारों का डुमरांव राज से जीविकोपार्जन होता है। कमल सिंह की बहुत बुजुर्ग हो चुके हैं, इनके बाद युवराज चंद्र विजय सिंह राजनीति में काफी रुचि लेते थे, मगर युवराज चंद्र विजय सिंह के पुत्र शिवांग विजय सिंह, जो युवाओं के बीच काफी पापूलर भी हैं, भारतीय जनता पार्टी की राजनीति करते हैं।

*‘कमल’ सिंह का ‘कमल’ निशान हमेशा बना रहा।*

राजा कर्ण सिंह, माधव राव सिंधिया, पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह, त्रिपुरा स्टेट, रीवा स्टेट सहित कई स्टेटों से डुमरांव महाराजा की रिश्तेदारी है। इसमें से कई परिवार राजनीति के शिखर पर हैं। वर्ष 1980 में जिस कमल के फूल को भाजपा ने अपना सिंबल बनाया उसी को अपना सिंबल बनाकर 1952 से लेकर 1962 तक महाराजा बहादुर कमल सिंह निर्दलीय चुनाव जीतकर संसद पहुंचने वाले युवा सांसद हुए थे। इस रियासत की खास बात ये है कि आज भी यह परिवार कमल निशान पर ही भरोसा जताता है।