द पॉलिटिक्स अगेन
आरक्षण पर मोदी करेंगे इन उपायों पर विचार? क्या इस हल से बदल सकती है आरक्षण की सियासत
जब अपना देश आजाद हुआ तो लोगों ने सुनहरे सपने देखे थे। देश लोगों से बनता है। देश का विकास लोंगों के विकास से जुड़ा होता है, लेकिन यह विकास सिर्फ आर्थिक विकास से जुड़ा नहीं है, बल्कि सर्वांगीण विकास से जुड़ा है। सामाजिक विकास से जुड़ा है। मनोवैज्ञानिक एवं आत्म-सम्मान के विकास से जुड़ा है।
दरअसल, जब तक सभी तबकों का विकास नहीं होगा, देश का समुचित विकास नहीं माना जाएगा। संविधान के निर्माताओं एवं देश के सर्वांगीण विकास के लिए बेचैन लोंगों को यह चिंता थी, कि सामाजिक तौर पर पिछड़े, दबे- कुचले लोगों को कैसे नीचे से खींच कर ऊपर लाया जाए? इनके मानवीय हक कैसे मुहैया कराया जाए?
सामाजिक न्याय, समरसता एवं बराबरी का दर्जा कैसे दिया जाए? इसको मूर्त रूप देने के लिए “आरक्षण ” की अवधारणा पर विचार किया गया। यह अवधारणा कुछ ऐसी है, जैसे गढ्ढे में गिरे आदमी को बाहर निकालने के लिए एक सक्षम व्यक्ति आगे हाथ बढ़ाता है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति के कई संतानों में अगर कोई संतान किसी तरह से कमजोर है तो उसे विशेष सुविधा देकर बाकी के बराबर लाने की कोशिश करता है।
इन अवधारणाओं के आधार पर हमारे संविधान ने भारतीय गणराज्य को एक लोक-कल्याणकारी राष्ट्र घोषित किया। इस राष्ट्र का कर्तव्य निश्चित हुआ कि यह नीतियां बनाकर प्रयास करेगा कि सामाजिक एवं आर्थिक विषमताओं को कैसे कम किया जाए। इसके लिए नौकरियों एवं शिक्षण संस्थानों में “आरक्षण” की व्यवस्था की गई। ऐतिहासिक कारणों से जो वर्ग पिछड़ गया, उसे चिन्हित किया गया।
कुल मिलाकर अवधारणा यह है कि सामाजिक रूप से पिछड़े जो लोग हैं, उन्हें आगे आने का अवसर प्राप्त होगा। सामाजिक उत्थान के व्यापक लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रभावकारी एवं गतिशील नीतियां नहीं बन पायीं। नतीजा, ढाक के तीन पात। होना तो यह चाहिए था कि हर वर्ग में जो व्यक्ति “आरक्षण” का लाभ लेकर आगे बढ़ गए उन्हें फिर से लाभ नहीं मिलना चाहिए। उन्हें खुद ही अपने वर्ग के दूसरे लोगों के लिए अपना दावा खत्म कर देना चाहिए। उसी तरह से अगड़े वर्ग के लोगों को भी अपने वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए करना चाहिए।