द पॉलिटिक्स अगेन
निधि चाय का कप हाथ में लिए बालकनी से सामने
निधि चाय का कप हाथ में लिए बालकनी से सामने वाले पार्क को निहार रही थी! पार्क की हरी ताजा घास ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने पूरे पार्क में हरे मखमल की चादर बिछा दी हो। हर उम्र के लोग पार्क की शोभा बढ़ा रहे थे।
शाम के वक्त पार्क एक छोटे से मेले की तरह लगता है, जहां बच्चे झूलों का आनंद लेते हैं, तो महिलाएं गुट बनाकर गपियाती हैं, बुजुर्ग भी अपनी सेना के साथ कभी बच्चों को तो कभी वर्तमान समय जो कि उनके अनुसार विकट बुरा चल रहा है, कोसते नजर आते हैं। इस पार्क में लोगों की भीड़ देखकर कुछ गुडिया के बाल वाले और चना जोर गर्म बेचने वाले भी इनदिनों आने लगे हैं और इनके आते ही बच्चे मम्मियों और दादा-दादी के पास पैसे लेने के लिए दौड़ पड़ते हैं। अपने इस पार्क चित्रण पर निधि खुद ही मुस्कुरा उठी, उसे याद आया ललित उसे यूं ही नहीं सिरफिरी दार्शनिक कहता है, जरूर उसके अन्दर किसी न किसी फिलोसोफर की आत्मा कुंडली मारे बैठी हुई है।
निधि का ध्यान पुन: पार्क की हरी भरी मखमली घास पर जाकर टिक गया और वह फिर अपने दार्शनिक विचारों में उलझ खुद से ही बात करने लगी “:कितना मनभावन है यह हरा मैदान, न कोई कांटेदार झाडिया, न ही सूखे पीले पड़े पत्ते, न ही कोई वृक्ष का सूखा ठूंठ सब कुछ मानो करीने से की गई पेंटिंग की तरह निपुणता से रचा है विधाता ने, काश कि उसका जीवन भी ऐसी निपुणता के साथ सजा संवरा रूप लिए होता, जैसा यह मखमली घास वाला पार्क है, जहां न गलतियों की कांटेदार झाड़ियां होतीं न ही खुद को सही सिद्ध करता अहम का सूखा ठूंठ, जीवन ऐसा ही सुर्ख मखमली घास वाला पार्क होता, जहां मोहब्बत गीत गाती और उन गीतों पर रिश्ते रक्स करते, जहां ख्वाईशें मुस्कुरातीं और एक दूसरे से की गई उम्मीद ख़ुशी बन झिलमिलाती, मगर कहां है उसकी जिन्दगी मखमली? यह तो उलझे-सुलझे रिश्तों की महज एक गांठ बनकर रह गई है। कभी-कभी यह गाँठ इंसान को दर्द देती है, मगर कभी-कभी कैंसर बन इंसान को ही लील लेती है “उसकी जिन्दगी कौन सी गांठ है यह निधि अब तक नहीं समझ पायी।
जो मैं जानती
प्रीत करे दुःख होय
नगर ढिंढोरा पीट के कहती
प्रीत न करियो कोय “
प्रीत करके दुःख ही क्यों मिलता है ? निधि सोचने लगी कितना प्यार जताता था, ललित शादी से पहले, चांद तारे तोड़ लाने की बात करता था। अब तो उससे सूखे कपड़े छत से उठाकर लाने को कहो तो सीधा जवाब होता है मैं किसी का नौकर नहीं हूं खुद जाके ले आओ, ऊंह भला ये भी कोई बात हुई मैंने इतने सारे कपड़े धोये मैं नौकर नहीं बनी मगर उसे सिर्फ उठा कर लाने को कहा तो वह नौकर हो गया। ये पुरुष और उनका झूठा दंभ। खुद तो घर के किसी काम में मदद नहीं करता, सुबह छह बजे से लेकर रात ग्यारह बजे तक मशीन की तरह लगी रहती हूं, उस पर भी प्यार जताने या तारीफ करने के बजाय कहता है “जरा सज संवर कर रहा करो तुम्हारी बुझी-बुझी सी शक्ल और बिखरी बिखरी वेशभूषा देख ऑफिस से आते ही मूड की ऐसी-तैसी हो जाती है।
पत्नियां तो ऐसी होती हैं कि सुन्दर साड़ी और मेकअप में खुशबू से चहकती दरवाजा खोल पति का स्वागत करें, कहें कि आओ प्यारे पतिदेव और यह कहने के साथ ही पति का बैग उसके हाथ से लेकर उसे चाय पानी सर्व करें और फिर गले में बांहें डाल प्रेम से पूछें “आज का दिन कैसा रहा डार्लिंग?”